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राजस्थान की सियासत में दबदबे के लिए मिर्धा परिवार की नई पीढ़ी को खासी जद्दोजहद करनी पड़ रही है

शेखावाटी की सियासत इन दिनों नए दौर से गुज़र रही है. भाजपा ने हनुमान बेनीवाल को साथ लेकर मिर्धा परिवार का खेल बिगाड़ने की कोशिश की है. युवाओं में लोकप्रिय बेनीवाल पूरी शेखावाटी बेल्ट के परिणाम को बदलने में सक्षम है, यही वजह है की पूर्व सीएम की नाराज़गी की चिंता किए बगैर भाजपा ने बेनीवाल से हाथ मिलाया है. दूसरी और नागौर की पूर्व सांसद और मिर्धा परिवार की चौथी पीढ़ी ज्योति मिर्धा भी जीत का डैम भर रहीं है.

दरअसल, मिर्धा परिवार प्रदेश की जाट राजनीति का बड़ा सियासी ब्रांड जरूर है लेकिन उसकी नई पौध आज असुरक्षा और ऊहापोह के दौर से गुजर रही है. परिवार का ब्रांड नाम अब उनके सियासी प्रभाव के लिए नाकाफी नजर आ रहा है. कुनबे की सियासी कदकाठी कमजोर होने की वजह है परिवार का दो धड़ों में बंटा होना. एक ओर है नाथूराम मिर्धा का परिवार, जिसका मोर्चा अभी रिछपाल और उनकी भतीजी ज्योति ने संभाल रखा है. दूसरे गुट में रामनिवास मिर्धा के बेटे हरेंद्र और पोते रघुवेंद्र मोर्चे पर हैं. यह कुनबा न केवल दो धड़ों में है बल्कि चुनावी मौके पर एक-दूसरे को निबटाने में भी नहीं चूकता.

क्या है परिवार इतिहास
मिर्धा परिवार आजादी से पहले मारवाड़ का नेतृत्व करने वाला एक बड़ा परिवार था. बलदेवराम मिर्धा जोधपुर दरबार में पुलिस में डीआइजी थे. रिटायर होने पर किसानों के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने 1946 में मारवाड़ किसान सभा बनाई. कुछ दिनों बाद इसका कांग्रेस में विलय हो गया और यह परिवार कांग्रेस से जुड़ गया. इससे पहले मारवाड़ में कांग्रेस की कोई हैसियत नहीं थी. इसके बाद शुरू हुई परिवार की सक्रिय राजनीति. बलदेवराम ने आजादी के बाद पहला चुनाव 1952 में डेगाना से लड़ा लेकिन वे हार गए. उनकी विरासत संभालने के लिए उनके बेटे रामनिवास और दूर के रिश्ते के भतीजे नाथूराम तैयार हो चुके थे. रामनिवास ने एमए, एलएलबी और विदेश में पढ़ाई की तो नाथूराम ने एमए और एलएलबी लखनऊ से की. उस वक्त उच्च शिक्षा लेने वाला यह परिवार प्रदेश की राजनीति में बुलंदियां छूने को बेताब था. तब शायद बलदेवराम भी नहीं जानते थे कि बाद में ये दोनों राजनीति में एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे. रामनिवास उस वक्त विदेश में थे तो बलदेवराम ने नाथूराम को मारवाड़ किसान सभा से जोड़ा था. 1952 में नाथूराम मेड़ता से विधायकी का चुनाव जीत गए. इसके बाद 1967 तक वे विधानसभा में मंत्री पद पर बने रहे. 1952 में ही विधायकी का चुनाव लड़कर रामनिवास भी राजनीति में कूद पड़े. 1967 तक वे विधानसभा में रहे. 1957 से 1967 के बीच एक लंबे अरसे वे स्पीकर के पद पर रहे.

एक तरफ जमीनी मुद्दों से जुड़े नाथूराम का सियासी वजूद उफान भर रहा था तो दूसरी तरफ केंद्र में कांग्रेसी नेताओं पर गहरी पकड़ वाले रामनिवास भी ऊंचाइयां छू रहे थे. इसी दरम्यान दोनों लोकसभा के रास्ते से केंद्र की राजनीति में चले गए. रामनिवास केंद्र में कई अहम पदों पर रहे तो नाथूराम भी उनसे कम न रहे. 1971 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता. लेकिन आपातकाल में नाथूराम ने कांग्रेस छोड़ दी और चौधरी चरण सिंह की अगुवाई वाले दलित मजदूर किसान पार्टी से जा जुड़े.

यहीं सियासत की जाजम पर नाथूराम और रामनिवास एक-दूसरे के दुश्मन बन गए. 1984 के लोकसभा चुनाव में नागौर संसदीय सीट से नाथूराम और रामनिवास आमने-सामने आ गए. इंदिरा गांधी की मौत से उपजी सहानुभूति लहर में चुनाव रामनिवास ने ही जीता. 1996 के लोकसभा चुनाव में नाथूराम जीते पर कुछ दिनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई. तब उपचुनाव में बेटे भानुप्रकाश ने रामनिवास को हराकर हिसाब बराबर किया.

गेहलोत से नहीं रहे अच्छे संबंध
यह आपसी लड़ाई अगली पीढ़ी में तेज हो गई. रामनिवास की बागडोर हरेंद्र ने संभाली तो नाथूराम के उत्तराधिकारी बने उनके भतीजे रिछपाल. हरेंद्र ने 1980 में बतौर विधायक अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की. 1988 के जिला प्रमुख के चुनाव में दोनों गुट एक बार फिर आमने-सामने आ खड़े हुए. इस दिलचस्प लड़ाई में हरेंद्र ने रिछपाल को आखिरकार 4 मतों से मात दे दी. इसके बाद हरेंद्र कांग्रेस में कई अहम पदों पर रहने के अलावा 1993 से 2003 तक राज्य में मंत्री रहे. रिछपाल 1990 में जनता दल के टिकट पर विधायक बने. अगले चुनावों में नाथूराम के साथ वे भी कांग्रेस में आ गए फिर अगला चुनाव कांग्रेस से जीता. रिछपाल ने विधायकी का अपना तीसरा चुनाव निर्दलीय के रूप में जीता और फिर अगले दो चुनाव कांग्रेस से लड़े. 2008 का चुनाव वे हार गए.
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इस परिवार के संबंध अच्छे नहीं रहे हैं लेकिन इसने कभी खुलकर उनका विरोध भी नहीं किया. कांग्रेस में ऊपर तक इसकी पहुंच रही है. लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी के चक्कर में परिवार के लोग खुद के ही दुश्मन बन गए.

जाट लैंड का नया सूरमा हनुमान बेनीवाल
करीब 15 साल पहले जोधपुर में एक जाट समाज की एक सभा हो रही थी। उस समय राजस्थान बीजेपी के पास कोई बड़ा जाट चेहरा नहीं था इसलिए दिल्ली के जाट नेता और वाजपेयी सरकार के मंत्री साहब सिंह वर्मा को राजस्थान के जाट बाहुल्य वाले इलाकों में प्रचार के लिए भेजा गया था. जोधपुर की इस सभा को भी वही संबोधित करने जा रहे थे। वर्मा समय पर नहीं पहुंचे तो भीड़ छंटने लगी लेकिन उस वक्त ऐसा कोई वक्ता नहीं था जो भीड़ को बांध सके। इतने में राजस्थान यूनिवर्सिटी का एक छात्रनेता मंच पर पहुंचा और अपने भाषण से समां बांध लिया। ये नेता हनुमान बेनीवाल ही थे जो अपनी भाषण शैली से ऐसे लोकप्रिय हुए कि आज तक कोई सियासी पार्टी उनका तोड़ नहीं निकाल पाई है।

राजस्थान यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट रहे खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल की पैदाइश नागौर में हुई। छात्र राजनीति से पॉलिटिक्स में कदम रखने वाले बेनीवाल ने राजनीति की शुरुआत में बीजेपी ज्वॉइन की थी हालांकि उनके पिता कांग्रेस के नेता थे। 2010 में उन्होनें खुलेआम बीजेपी के नेताओं को भ्रष्ट करार दिया और कांग्रेस-बीजेपी की सांठगांठ होने के आरोप लगाते हुए अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, जिसके बाद उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी। लेकिन बेनीवाल कहां रुकने वाले थे, 2013 में अपने विधानसभा क्षेत्र खींवसर से वे निर्दयलीय प्रत्याशी के रुप में फिर खड़े हुए और मोदी लहर के असर के बावजूद भी रिकॉर्ड मतों से जीत हांसिल की। बेनीवाल नागौर, बाड़मेर, बीकानेर, सीकर और जयपुर जिलों में 5 सफल हुंकार रैलियों का आयोजन किया जिनमें जुटी लाखों की भीड़ की गूंज दिल्ली तक जा पहुंची।

बीजेपी से बागी होकर बेनीवाल ने ‘राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी’ का गठन किया और इस बार के चुनाव में उन्होनें ज्यादातर दोनों पार्टियों के बागी नेताओं को टिकट दिया है। बेनीवाल धुंआधार प्रचार कर रहें हैं और एक दिन में 6 से 8 सभाएं करते हैं। भाषण देने में माहिर बेनीवाल की रैलियों में आने वाली भीड़ को देखकर दोनों सियासी पार्टियों के पसीने छूट रहे हैं। लोकप्रियता ऐसी की खड़े होने की जगह ना मिलने पर लोग भाषण सुनने के लिए लोग खंभो पर भी चढ़ जाते हैं।बदलते समीकरणो के बाद अब बेनीवाल भाजपा के साथ है। अब देखना ये होगा की गेहलोत-पायलट की जोड़ी भाजपा के इस डाव का कैसे करेगी

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