July 1, 2022

प्रॉपर ट्रीटमेंट से अस्थमा पेशेंट को मिलेगी राहत, बरतनी चाहिए ये खास सावधानियां

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डब्ल्यूएचओ (WHO) के अनुसार प्रतिदिन लगभग 1000 लोगों की मौत अस्थमा (Asthma) के कारण हो जाती है। दुनिया भर में 339 मिलियन से अधिक लोग अस्थमा रोग से प्रभावित हैं, जिनमें से भारत में 20-30 मिलियन लोग अस्थमा से पीड़ित हैं। इन आंकड़ों से अस्थमा की गंभीरता को समझा जा सकता है। इसके कारण, लक्षण, उपचार और सावधानियों के बारे में जानिए। अस्थमा रोग मुख्यत: एलर्जी से संबंधित बीमारी है। वातावरण में धूल, धुएं आदि के कण सांस के जरिए सांस नली में पहुंच जाते हैं। इससे सांस लेने में दिक्कत आती है। जो धीरे-धीरे अस्थमा का रूप ले लेती है। इसी को ध्यान में रखते हुए हर साल मई के पहले मंगलवार को ‘वर्ल्ड अस्थमा डे’ (world asthma day) मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य अस्थमा से प्रभावित लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करना है।
कोरोना पेशेंट रहें एलर्ट
अगर देखा जाए तो कोरोना (Coronavirus) की मौजूदा स्थिति चौथी लहर का संकेत दे रही है। कोरोना इंफेक्शन से हमारे फेफड़े, गला और नाक प्रभावित होते हैं। इसलिए ऐसे लोग जो अस्थमा से पीड़ित है, उन्हें कोरोना की वजह से अस्थमा अटैक आ सकता है। या फिर न्यूमोनिया और अन्य गंभीर लंग्स डिजीज की वजह से उनकी स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में अस्थमा के मरीजों को विशेष रूप से सावधानी बरतने की जरूरत है।
रोग के कारण
इस रोग के कारणों के बारे में नारायणा हॉस्पिटल, गुरुग्राम के कंसल्टेंट पल्मोनरी एंड स्लीप मेडिसिन-डॉ. शिबा कल्याण बिस्वाल, बताते है, अस्थमा के मरीजों सांस की नली में सूजन आ जाती है, जिसके कारण उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगती है। इससे बचने के लिए सबसे पहले यह पहचानना जरूरी है कि आप में दिखने वाले लक्षण दमा के हैं या नहीं। क्योंकि हर बार सांस फूलना अस्थमा नहीं होता है, लेकिन अगर किसी को अस्थमा है तो उसकी सांस जरूर फूलती है। अस्थमा के रोगियों में सांस फूलना, सांस लेते समय सीटी की आवाज आना, लंबे समय तक खांसी आना और सीने में जकड़न होना आदि लक्षण दिखाई देते है। इन दिनों सभी आयु वर्ग के लोग अस्थमा की बीमारी के शिकार हो रहे हैं। जिसका मुख्य कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या, खान-पान का ठीक ना होना और अस्थमा के प्रति जागरूकता की कमी है। प्रदुषण, तापमान में बदलाव, एलर्जी, स्मोकिंग, धूल और धुएं के ज्यादा संपर्क में रहने से अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है। प्रदूषण के कारण दूषित हवा जब हमारे फेफड़ों में पहुंचती है तो इससे सांस लेने में परेशानी होने लगती है। इससे बचने के लिए बाहर निकलते समय अच्छी गुणवत्ता वाले मास्क का प्रयोग करें, अपने मुंह को ढंककर रखें।
इसके अलावा अगर आप बार-बार सर्दी, बुखार से परेशान हैं, तो यह एलर्जी का संकेत हो सकता है। अस्थमा की शुरुआत वायरल इंफेक्शन से हो सकती है। इससे बचने के लिए संतुलित जीवनशैली अपनाएं और सही समय पर डॉक्टर से इलाज कराएं। यह कई प्रकार का हो सकता है।
एलर्जिक अस्थमा: अगर आपको धूल-मिट्टी के संपर्क में आने से सांस लेने में किसी प्रकार की तकलीफ महसूस होती है तो उसे एलर्जिक अस्थमा कहते हैं।
नॉनएलर्जिक अस्थमा: जब आप बहुत अधिक तनाव में हों और आपको अचानक सर्दी लगे या खांसी-जुकाम हो जाए, यह नॉनएलर्जिक अस्थमा के कारण होता है।
एक्सरसाइज इनड्यूस अस्थमा: कई लोग अधिक एक्सरसाइज और शारीरिक गतिविधि के कारण भी अस्थमा के शिकार हो जाते हैं।
ऑक्यूपेशनल अस्थमा: इस प्रकार के अस्थमा के अटैक अचानक काम के दौरान पड़ता है। नियमित रूप से लगातार आप एक ही तरह के काम करते हैं तो अकसर आपको इस दौरान अटैक पड़ने लगते है, इसे ऑक्यूपेशनल अस्थमा कहते हैं।
चाइल्ड ऑनसेट अस्थमा: इस प्रकार का अस्थमा सिर्फ बच्चों को ही होता है। अस्थमेटिक बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, इस प्रकार के अस्थमा से अपने आप ही बाहर आने लगता है। यह अस्थमा गंभीर नहीं होती है और उचित समय पर इलाज से बच्चे को बचाया जा सकता है।
अस्थमा के लक्षण-उपचार
श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट, दिल्ली के सीनियर कंसल्टेंट-रेस्पिरेटरी मेडिसिन डॉ. अनिमेष आर्य के अनुसार छाती में तनाव होना, सांस फूलना, सांस से सीटी जैसी आवाज आना, सीने में जकड़न होना, बार-बार जुकाम होना, लंबे समय से खांसी आना, थकान महसूस होना, होंठ नीले पड़ना, नाखूनों का पीला पड़ना अस्थमा के लक्षणों में शामिल हैं।
वैसे तो अस्थमा का कोई इलाज नही है, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है। किसी प्रकार के लक्षण महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। अस्थमा को नियंत्रित करने में दवा का नियमित सेवन जरूरी है। इसके अलावा इंहेलर थेरेपी सही ढंग से लेना भी जरूरी है। अस्थमा के लिए इंहेलर्स सबसे अच्छी दवा है। इंहेलर्स से दवा सीधे फेफड़ों में पहुंचती है, जिससे पीड़ित को आराम महसूस होता है। यह सीरप के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद है। इससे बीमारी को नियंत्रित करने और पीड़ित को अटैक से बचाने तथा उसके फेफड़ों को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा दमा के मरीजों का इलाज ओरल टेबलेट और इंजेक्शन से भी किया जाता है। इसके साथ ही पीकलो मीटर जैसे सरल उपकरण अस्थमा का पता लगाने तथा इस पर निगरानी रखने के लिये उपलब्ध हैं। अधिकांश लोग बार-बार होने वाली कफिंग, सांस लेने में तकलीफ और छींक आने जैसे लक्षणों का उपचार स्वंय ही करने लगते है, जिससे उनकी परेशानी और अधिक बढ़ जाती है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के किसी प्रकार की दवा नही लेनी चाहिए। अस्थमा में खासतौर पर फेफड़ों की जांच की जाती है, जिसके अंतर्गत स्पायरोमेट्री, पीक फ्लो से जांच की जाती है।
बचाव के उपाय
अस्थमा के मरीजों को अपने खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इन्हें दूध या दूध से बने किसी भी पदार्थ का सेवन नही करना चाहिए।
•अस्थमा के मरीजों को मौसम बदलने के साथ ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। यदि आप डायबिटीज से पीड़ित हैं और आपको अस्थमा की परेशानी है तो आपको अपने खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
•अस्थमा के मरीजों को अपनी दवा का इस्तेमाल समय पर करना चाहिए, कभी दवा छोड़नी नहीं चाहिए। घर की सफाई के दौरान घर से बाहर ही रहें। केमिकल युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। धूल-धुंआ और धूम्रपान से बचकर रहना चाहिए। योग और मेडिटेशन की मदद से भी अस्थमा से बचा जा सकता है, लेकिन कोई भी योग करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें। सर्दी-जुकाम और गले में खराश की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से उपचार कराएं। पालतू जानवरों जैसे कुत्ता, बिल्ली के संपर्क से दूर रहें।
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सही ढंग से करें इंहेलर यूज
अस्थमा से पीड़ित अधिकांश पेशेंट्स को इंहेलर प्रयोग करने से फायदा नहीं मिल पाता, जिसका कारण इंहेलर का गलत तरीके से प्रयोग करना होता है। इस बारे में डॉ. नवनीत सूद, सीनियर कंसंल्टेंट पल्मोनोलॉजी, धर्मशिला नारायणा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली बताते हैं कि इंहेलर का सही ढ़ंग से प्रयोग ना करने पर दवा के कण सांस की नली में नहीं पहुंच पाते, जिससे दवा गले में ही रह जाती है, इससे मरीज को आराम नहीं मिल पाता है। एक रिसर्च के अनुसार इंहेलर के गलत इस्तेमाल के कारण गले में दवा के कण इकट्ठे होने से गले के कैंसर होने का खतरा भी होता है। इसलिए इंहेलर इस्तेमाल करने का सही तरीका हमेशा डॉक्टर से चेक कराते रहें, जिससे अस्थमा को नियंत्रित करने में मदद मिल सके। पेशेंट को इंहेलर का प्रयोग करते समय तुरंत मुंह नहीं खोलना चाहिए, जिससे दवा के कण सीधे फेफड़ों में पहुंच सकें।
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