May 21, 2022

Knowledge News: क्यों शुरु किया गया था खेड़ा सत्याग्रह, जानिए आन्दोलन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

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Knowledge News: भारत (India) में अंग्रेजो के शासनकाल (British Rule) के दौरान उनकी बर्बरता और नांइसाफी के खिलाफ कई आन्दोलन चलाए गए जिसमें से एक था गुजरात का खेड़ा सत्याग्रह आन्दोलन (Kheda Satyagrah Movement)। खेड़ा सत्याग्रह आन्दोलन को साल 1917 में गुजरात (Gujarat) के खेड़ा डिस्ट्रिक्ट (Kheda District) में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi), सरदार वल्लभ भाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) और वहां के लोकल वकीलों ने साथ मिलकर शुरु किया था। इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजो द्वारा किसानों पर बढ़ाए गए कर पर रोक लगाना और किसानों के साथ हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाना था। गांधी द्वारा शुरु किए गए आंदोलन में चम्पारण सत्याग्रह (Champaran Satyagrah) के बाद ये दूसरा आन्दोलन था, जो कि हमारे देश को मिली स्वतंत्रता में एक अहम भूमिका निभाता है।
क्यों हुई थी आन्दोलन की शुरुआत
साल 1917 से 18 के बीच जब खेड़ा रीजन में ब्रिटिश सरकार ने कर में 23 प्रतिशत वृद्धि कर दी, तो इससे वहां के किसानों के आगे समस्या खड़ी कर दी। दरअसल इस परेशानी की वजह छप्पनिया अकाल, हैजा और प्लेग जैसी कई वजह थी, जिनसे आम जनमानस उबर नहीं पाया था। नडियाद कलेक्टर ने सरदार पटेल और महात्मा की बैठकों के बावजूद करों की ‘अनावरी’ प्रणाली से किसी भी तरह की सहायता से इनकार कर दिया। पटेल और उनके सहयोगियों ने एक प्रमुख कर विद्रोह का आयोजन किया, और यहां की सभी विभिन्न जातीय और जाति समुदायों ने रैलियां की। खेड़ा के किसानों ने अकाल के मद्देनजर इस वर्ष के लिए कर को समाप्त करने की मांग करते हुए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए, लेकिन बॉम्बे में सरकार ने चार्टर को खारिज कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसानों ने भुगतान नहीं किया, तो उनकी भूमि और संपत्ति को जब्त कर लिया जाएगा और कई को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

क्या था ब्रिटिश सरकार का रवैया
इसके बाद जब लोगों ने टैक्स नहीं दिया तो सरकार के कलेक्टरों और निरीक्षकों ने संपत्ति और मवेशियों को जब्त करने के लिए ठगों को भेजा, जबकि पुलिस ने जमीन और सभी कृषि संपत्ति को जब्त कर लिया था। इसके विपरीत किसानों ने गिरफ्तारी का विरोध नहीं किया, न ही हिंसा में लगे बल का प्रतिकार किया। इसके बजाय, उन्होंने गुजरात सभा जो आधिकारिक तौर पर विरोध का आयोजन कर रही थी उसे दान करने के लिए अपनी नकदी और कीमती सामान का इस्तेमाल किया।
एकजुटता के साथ खड़े रहे किसान
अनुशासन और एकता के साथ हो रहा ये विद्रोह आश्चर्यजनक था। यहां तक कि जब उनकी सारी निजी संपत्ति, जमीन और आजीविका जब्त कर ली गई, तब भी खेड़ा के किसानों का एक बड़ा हिस्सा पटेल के समर्थन में मजबूती से एकजुट रहा। अन्य हिस्सों में विद्रोह के प्रति सहानुभूति रखने वाले गुजरातियों ने सरकारी तंत्र का विरोध किया, और विरोध करने वाले किसानों के रिश्तेदारों और संपत्ति को आश्रय देने में मदद की। जिन भारतीयों ने ज़ब्त की गई ज़मीनों को खरीदना चाहा, उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। हालांकि सरदुल सिंह कवीशर जैसे राष्ट्रवादियों ने अन्य हिस्सों में सहानुभूतिपूर्ण विद्रोह का आह्वान किया, गांधी और पटेल ने इस विचार को दृढ़ता से खारिज कर दिया।

क्या निकले परिणाम
जब ब्रिटिश सरकार का हर पैंतरा विफल होता नजर आया तब सरकार ने दोनों पक्षों के लिए एक सम्मानजनक समझौते को बढ़ावा देने की मांग की। उस साल के कर को विचाराधीन रखा गया जबकि आने वाले साल के लिए इसे निलंबित किया जाना तय हुआ। इसके साथ ही सरकार ने कहा कि दर में वृद्धि को कम कर दिया जाएगा, जबकि सभी जब्त की गई संपत्ति वापस कर दी जाएगी। जब्त की गई जमीनों को उनके असली मालिकों को लौटाने के लिए भी लोगों ने एकजुट होकर काम किया। हालांकि अंग्रेजी हुकुमतों ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि जमीनों को वापस करना न करना खरीददारों पर निर्भर करता है, लेकिन जिन लोगों ने इन जब्त की गई जमीनों को खरीदा था, उन्हें इसे वापस करने के लिए प्रभावित किया गया। इसी तरह खेड़ा सत्याग्रह की गिनती उन सफल आन्दोलन में हुई जिन्होंने देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
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