May 21, 2022

Knowledge News: क्या था चम्पारण सत्याग्रह? यहां मिलेगी आपको इस आंदोलन से जुड़ी हर जानकारी

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Knowledge News: भारत को स्वतंत्रता (Freedom Of India) देश के लोगों के कड़े संघर्षों के बाद हासिल हुई है। अंग्रेजों के शासन काल (British Rule) में भारतीयों (Indian) को कई तरह से प्रताड़ित किया जाता था। इन प्रताड़नाओं का विरोध करने के लिए बहुत से आंदोलन (Movements) चलाए गए, जिनमें से एक था साल 1917 का चम्पारण आंदोलन (Champaran Movement)। अपनी इस स्टोरी में हम इस आंदोलन से जु़ड़ी सभी जानकारियों पर बात करेंगे…
चम्पारण सत्याग्रह
चम्पारण किसान आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन का एक हिस्सा था। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी ने चंपारण (बिहार) और खेड़ा (गुजरात) किसान संघर्षों का नेतृत्व कर असहयोग का प्रयोग किया। चम्पारण सत्याग्रह का मूल विचार किसानों को लामबंद करना और उनकी मांगों को पूरा करना था। चम्पारण का किसान आंदोलन 1917-1918 में शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय बागान मालिकों के खिलाफ किसानों में जागृति पैदा करना था। इन बागानों के मालिक किसानों को उनके श्रम के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक यानी वेतन नहीं दे रहे थे और इसके साथ ही किसानों का शोषण भी कर रहे थे।
यूरोपीय बागान मालिकों ने नील की खेती के सभी प्रकार के अवैध और अमानवीय तरीकों का सहारा लिया। किसानों का न केवल यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा बल्कि स्थानीय जमींदारों द्वारा भी शोषण किया जाता था। ऐसी स्थिति में महात्मा गांधी ने उनका मुद्दा उठाया और आंदोलन शुरू किया।
चम्पारण किसान संघर्ष के कुछ अहम बिंदु
कैसा हुआ आंदोलन का अंत
महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह आंदोलन की सफलता के बाद भारत लौट कर आए ही थे, कि उन्हें किसानों की दुर्गति के बारे में पता चला। इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने चम्पारण में सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की। लेकिन इस आंदोलन को जल्द ही खत्म कर दिया गया। दरअसल, अंत में चौरी-चौरा की घटना के कारण आंदोलन हिंसक हो गया। इस घटना से गांधीजी बहुत दुखी हुए। चंपारण के किसानों पर अत्याचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बहुत गंभीर तरीके अपनाए। अधिक लगान न देने पर किसानों को प्रताड़ित किया गया। चंपारण के किसानों को गंभीर पीड़ा और दुख से गुजरना पड़ा।
जहां एक ओर इस आंदोलन के बुरे परिणाम साबित आ रहे थे वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी के इस सत्याग्रह के कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आए। 1 मई 1918 को भारत के गवर्नर-जनरल द्वारा चंपारण कृषि अधिनियम को मंजूरी दी गई थी। अहिंसा की विचारधारा ने आंदोलन में भाग लेने वाले किसानों को बहुत ताकत दी थी। इस आंदोलन ने राष्ट्रवाद के विकास में भी योगदान दिया। आज भी चंपारण संघर्ष को राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा माना जाता है।
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