November 28, 2022

Knowledge News : हरे, पीले या नीले रंग के बजाए क्यों सिर्फ ब्लैक कलर के ही होते हैं टायर, जानिए इसके पीछे का तथ्य

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जब भी आप कभी फोन, कपड़े या कार जैसी चीजे खरीदने बाहर जाते हैं तो आप उन्हें अपनी पसंद के हिसाब से लेकर आते हैं। अगर उन चीजों में आपको कलर भी आपके पसंद का न मिले तो आप उसे लेना तक पसंद नहीं करते। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब हर चीज में विकल्प मिल सकते हैं तो टायर में क्यों नहीं। आखिर क्यों टायर ब्लैक यानि काले कलर के ही होते हैं। फिर चाहें साइकिल हो या फिर हवाईजहाज सबके टायर का कलर ब्लैक ही होता है। अगर आप नहीं जानते तो चलिए हम आपको आज अपनी इस खबर में टायर (Tyre) के इतिहास से लेकर सब कुछ बताते हैं। बताते हैं कि आखिर ये टायर ब्लैक कलर (why tyres are always in black colour) के क्यों होते हैं।
टायरों का इतिहास
टायर का इतिहास लगभग 1800 से शुरू होता है। टायर फ्रेंच के शब्द टायरर से बना है, इसका मतलब होता है खींचने वाला। हवा वाले रबर के टायरों से पहले लोग लकड़ी या लोहे के बने टायर का इस्तेमाल करते थे, जो पहियों को टूटने से सुरक्षित रख सकते थे।
किसने बनाया पहला टायर
सबसे पहले रबर के टायरों का आविष्कार व्हीलराइट नाम के एक कारीगर ने किया था। चार्ल्स मैकेंतोष ने 1800 में अमेजन और दूसरे स्थानों के वृक्षों से निकलने वाले द्रव से रबर बनाया। लेकिन उसका तालमेल मौसम के साथ नहीं बैठा पाया। तब जाकर चार्ल्स गुडईयर 1839 में वूलकैनाइज्ड रबर का आविष्कार किया। जो मजबूत और खींचा जा सकने वाला था। इसका इस्तेमाल सबसे पहले साइकिल में हुआ। इसके बाद 1845 में न्यूमेटिक या हवा भरे टायर बनाए गए। इस आविष्कार को राबर्ट विलियम थामसन ने अपने नाम से पेटेंट कराया। इसके आविष्कारकर्ता थामसन स्कॉटिस थे। उन्होंने चमड़े के कवर के अंदर हवा भरने के लिए बहुत से आकार के पतले ट्यूब बनाए। यह इस तरह के थे कि टायर झटकों को बर्दाश्त कर सके। लेकिन यह कभी प्रोडक्शन में नहीं जा पाया, क्योंकि इसमें बहुत सी दिक्कतें थीं।
पहले सफेद हुआ करता था टायर का रंग
बहुत कम लोग ही शायद इस बात को जानते होंगे कि लगभग 125 साल पहले जब पहले रबर टायर का प्रोडक्शन किया गया तो ये सफेद रंग का था। जिन रबर का इस्तेमाल करके इनको बनाया गया था वो सफेद रंग की थी। लेकिन फिर अब यह काले रंग के कैसे हो गए तो इसका जवाब है कि यह सफेद टायर जिस रबर और मटीरियल से बनाया गए थे, वो इतना दमदार नहीं थे कि आटोमोबाइल के वजन को बर्दाश्त कर पाए। साथ ही सड़क पर भी अपना बेहतर प्रदर्शन दिखा पाए। इसलिए उसमें ऐसा कुछ करने की जरुरत हुई। जो उसे ज्यादा ताकतवर बना पाए और लंबे समय तक इसे चलाने लायक भी बनाए। तब इस रबर में कॉर्बन ब्लैक जैसे मटीरियल को मिलाया गया। इससे टायर का रंग बदलकर पूरी तरह काला हो गया। इसका रंग तो काला जरूर हुआ लेकिन टायर की ताकत, क्षमता और लंबे समय तक चल पाने की चीज बढ़ गयी।
कॉर्बन ब्लैक से किस तरह मिली मदद
कॉर्बन ब्लैक की वजह से सड़कों पर चलने में टायर और सड़क की सतह के बीच जो जबरदस्त घर्षण होता है, उसे टायर बर्दाश्त कर पाता है। यह गरम से गरम सड़क पर चलकर भी नहीं पिघलता और मजबूत बना रहता है। इसलिए ही आटोमोबाइल के हर सेक्शन में इन्हीं टायरों का इस्तेमाल किया जाता है। सिर्फ यही नहीं कॉर्बन ब्लैक टायर ओजोन के हानिकारक असर से लेकर यूवी रेडिएशन तक से बचाने में मददगार होता है। यही वजह है कि टायरों का रंग हमेशा काला होता है।
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