August 8, 2022

Health Tips: व्यसकों और बुजुर्गों के बाद अब बच्चों में भी बढ़ रहा डायबिटीज का खतरा, एक्सपर्ट्स से जानें कैसे करें उपचार

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डायबिटीज (Diabetes) एक जीवनभर साथ रहने वाली बीमारी है, आमतौर पर यह खतरनाक बीमारी मिड और ओल्ड एज के लोगों में देखी जाती है। लेकिन आजकल कुछ वजहों से यह बीमारी बच्चों और किशोरों में भी देखी गयी है। बच्चों को टाइप-1 डायबिटीज (Type-1 Diabetes) अपना शिकार बना रही है, वहीं समय पर सही उपचार न मिलने पर बच्चों और किशोरों को गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में पैरेंट्स को उनकी प्रॉपर केयर करनी जरूरी है, साथ ही उन्हें अपनी लाइफस्टाइल पर भी सही तरिके से ध्यान देना चाहिए। तो आइए जानते हैं कंसल्टेंट-डायबिटीज एक्सपर्ट फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम के डॉ. अतुल लूथरा की क्या राय है।
आज के दौर में डायबिटीज महामारी का रूप लेती जा रही है। हाल में जारी आईसीएमआर (ICMR) की रिपोर्ट में इस खतरे की ओर इशारा किया गया है। हमारा देश वर्ल्ड डायबिटीज कैपिटल की श्रेणी में आ गया है। अनुमान के मुताबिक 2050 तक दुनिया में सबसे ज्यादा डायबिटीज मरीज हमारे देश में होंगे। चिंताजनक बात यह है कि इंटरनेशनल डायबिटीज फाउंडेशन (आईडीएफ) के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों और किशोरों की संख्या सबसे ज्यादा भारत में है। हमारे देश का हर 65वां और दुनिया में हर 5वां बच्चा डायबिटीज से पीड़ित है। 2021 तक के आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में 15 साल से कम उम्र के 12.11 लाख से ज्यादा और भारत में तकरीबन 2.5 लाख बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से ग्रसित हैं। रिपोर्ट के हिसाब से आने वाले दिनों में अगर हमने इस बीमारी को नियंत्रित नहीं किया तो मुश्किलें और बढ़ती जाएंगी।

क्या है टाइप-1 डायबिटीज
टाइप-1 डायबिटीज या जुवेनाइल डायबिटीज छोटे बच्चों और किशोरों को होती है। इसमें मरीज के इम्यून सेल्स पेनक्रियाज ग्लैंड के बीटा सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। जिसकी वजह से शरीर में इंसुलिन हार्मोन का उत्पादन कम मात्रा में होता है। इंसुलिन रक्त में मौजूद ग्लूकोज को एनर्जी में परवर्तित करता है। इंसुलिन की कमी से यह कार्य ठीक तरह से नहीं हो पाता और रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है।
पैरेंट्स रहें सजग
आज 25-35 साल या कम उम्र के युवाओं को डायबिटीज भले ही उनके अनहेल्दी लाइफस्टाइल (Unhealthy Lifestyle) और अनहेल्दी फूड हैबिट्स (Unhealthy Food Habits) की वजह से होती हो। लेकिन यंग पैरेंट्स की लापरवाही की वजह से भी उनके बच्चों में भी डायबिटीज ट्रांसमिट हो सकती है। इस वजह से हर साल लगभग 16 हजार बच्चे डायबिटीज की चपेट में आ जाते हैं। अगर दोनों दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता को डायबिटीज है, तो बच्चों में डायबिटीज होने की संभावना 50-60 प्रतिशत रहती है। अगर किसी एक पैरेंट को डायबिटीज है, तो बच्चे में इसकी संभावना तकरीबन 30 प्रतिशत हो जाती है। टाइप-1 डायबिटीज होने पर बच्चे को न केवल जीवन भर इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ता है, बल्कि उसकी क्वॉलिटी ऑफ लाइफ पर भी असर पड़ता है। अगर डायबिटीज अनकंट्रोल रही तो आगे चलकर गंभीर बीमारियों की चपेट में आने और शरीर के विभिन्न अंग खराब होने का खतरा रहता है।
कैसे करें पहचान
टाइप-1 डायबिटीज से ग्रसित बच्चों में इसके लक्षण जल्द पकड़ में नहीं आते। अगर यहां बताए जा रहे कोई भी लक्षण दिखें तो बिना देर किए अर्ली स्टेज में ही बच्चे का शुगर लेवल चेक कराना चाहिए। जैसे-वजन कम होना, प्यास ज्यादा लगना, बार-बार पेशाब आना, थकावट और सुस्ती महसूस होना, घाव धीरे-धीरे ठीक होना, हमेशा भूखा महसूस करना, खुजली या स्किन डिजीज होना, धुंधला दिखना, चक्कर आना, पैरों की मांसपेशियों में ऐंठन होना।
एक्सपर्ट्स के अनुसार बच्चों में डायबिटीज के कुछ शुरुआती लक्षण होते हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि आगे चलकर उसको डायबिटीज हो सकती है जैसे-गर्दन के पीछे काली लाइन या पिगमेंटेशन, दाने होना, बगल या प्राइवेट पार्ट्स में कालापन होना। इसी स्टेज पर पैरेंट्स अगर बच्चे के खान-पान में बदलाव लाएं, नियमित रूप से व्यायाम करने की आदत डालें तो डायबिटीज को काफी हद तक कंट्रोल में कर सकते हैं। ऐसा न कर पाने की वजह से 15-20 साल की उम्र तक आते-आते उनको टाइप-2 डायबिटीज देखने को मिलती है।
क्या है नुकसान
रक्त में ग्लूकोज का उच्च स्तर शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। कंट्रोल न होने पर हार्ट अटैक, नजर का धुंधलापन, नसों को नुकसान, गंभीर इंफेक्शन और किडनी फैल्योर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आईसीएमआर के आंकड़ों के हिसाब से डायबिटीज के 16.3 प्रतिशत मरीजों को हाइपरटेंशन, 44 प्रतिशत मरीजों को हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा रहता है।
उपचार के तरीके
टाइप-1 डायबिटीज को नियंत्रित रखने के लिए इंसुलिन एनालॉग, पंप, इंसुलिन डिलिवरी सिस्टम एंड सेंसर जैसी तकनीकें काफी कारगर हैं। मरीज को इंसुलिन शॉट्स लेना अनिवार्य होता है। मरीज इंजेक्शन की जगह इंसुलिन पंप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यह रक्त में ग्लूकोज की नियमित रूप से जांच करता है और बताता है कि शरीर को कितने इंसुलिन की जरूरत है। आईसीएमआर की गाइडलाइन के अनुसार टाइप-1 डायबिटीज पेशेंट्स की डाइट में 50-55 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 25-35 फीसदी फैट और 15-20 फीसदी प्रोटीन शामिल होनी चाहिए।
इन पर करें अमल

आने वाली पीढ़ी के स्वस्थ भविष्य के लिए आज के युवाओं को जागरूक होना और अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना जरूरी है। वरना लापरवाही की वजह से न केवल आप टाइप-2 डायबिटीज का सामना करेंगे, बल्कि ट्रांसमिट होने के कारण आपके बच्चों को भी यह हो सकता है। इसलिए कुछ बातों पर अमल करें।
-40 वर्ष की उम्र के बाद या फैमिली में डायबिटीज की हिस्ट्री है, तो नियमित ब्लड ग्लूकोज की मॉनिटरिंग जरूर करवाएं।
-घर में हर उम्र के सदस्य एनुअल हेल्थ चेकअप जरूर कराएं। इससे किसी भी बीमारी के अर्ली डायग्नोसिस में मदद मिलेगी।
-खाने-पीने में संयम बरतें। न्यूट्रीशियस-बैलेंस्ड डाइट लें। डाइट में फाइबर, प्रोटीन की मात्रा ज्यादा हो। छिलके वाली दालें ज्यादा लें। लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स की फल-सब्जियों का सेवन ज्यादा से ज्यादा करें। घी या तेल, नमक और चीनी को सीमित मात्रा में इस्तेमाल करें। रिफाइंड, फास्ट फूड, अवॉयड करें।
-जहां तक हो सके स्ट्रेस से बचें। इसके लिए मेडिटेशन करें, अपने पसंदीदा कार्यों में खुद को बिजी रखें, सोशल सर्कल बढ़ाएं, भरोसेमंद व्यक्ति से अपने मन की बातें शेयर करें। नींद पूरी लें।
-रोजाना शारीरिक व्यायाम करना बहुत जरूरी है। कम से कम आधा घंटा फिजिकल एक्टिविटी जैसे-वॉकिंग, जॉगिंग, स्ट्रेचिंग या ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें।
प्रस्तुति-रजनी अरोड़ा
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