December 5, 2022

Prosopagnosia Disease: फेस पहचानने में होती है प्रॉब्लम तो एक्सपर्ट्स से जानें क्या है समस्या और इसका ट्रीटमेंट

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Prosopagnosia Diseases: प्रोसोपेग्नोसिया (Face Blindness) एक दिमागी बीमारी है। इससे ग्रस्त मरीज दूसरों के चेहरे को नहीं पहचान पाता है, जिससे वह परिवार, दोस्तों, सहकर्मियों और रिश्तेदारों के बीच असहज महसूस करता है। कोलकाता के फोर्टिस हॉस्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ. संजीव धानुका से जानिए इसके कारण, लक्षणों और ट्रीटमेंट। आठ वर्ष का सुशांत पढ़ने-लिखने में अच्छा है, किसी भी विषय को आसानी से समझ और ग्रहण कर लेता है। लेकिन फिर भी स्कूल में कोई बच्चा उसका दोस्त नहीं बनना चाहता। बच्चे उसे बेवकूफ या मंदबुद्धि समझते हैं। दरअसल, सुशांत अपने क्लासमेट्स को पहचान नहीं पाता और चेहरे देखकर उनके नाम भी नहीं बता पाता। इसीलिए अपने दोस्तों के बीच उसकी इमेज नासमझ बच्चे की बन गई है।
इसी तरह 65 वर्षीय कमल कुमार ब्रेन स्ट्रोक (Brain stroke) के इलाज के बाद घर लौटे तो अपनी पत्नी को सामने देख कर भी नहीं पहचान पाए। उन्होंने अपने बेटे से कहा, ‘आप मेरी पत्नी को बुला दीजिए।’ यानी, वे अपने बेटे को भी नहीं पहचान पाए। लेकिन सामने खड़ी उनकी पत्नी ने उनसे कुछ देर बातें की तो आवाज सुनकर उन्होंने पत्नी को पहचान लिया। ये दोनों मामले एक रेयर ब्रेन डिजीज प्रोसोपेग्नोसिया के हैं। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति अपने परिचित लोगों को भी चेहरा देखकर नहीं पहचान पाता। एक बार बता देने या समझ में आने के बाद कुछ ही देर बाद फिर से भूल जाता है। यहां तक कि वह अपनी ही तस्वीर को भी नहीं पहचान पाता। मेडिकली इसे ‘फेस ब्लाइंडनेस’ भी कहते हैं।
प्रोसोपेग्नोसिया का मरीज किसी व्यक्ति को उसकी आवाज सुनकर, स्पर्श करके, उसके कपड़े आदि देखकर तो पहचान सकता है लेकिन चेहरा नहीं पहचान पाता। इसमें मरीज को पुरानी बातें याद रखने में असुविधा नहीं होती। न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार हम किसी भी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को देखते हैं तो उसकी एक छाप या पहचान हमारे दिमाग में अंकित हो जाती है। इसके बाद हमारा दिमाग उसे प्रोसेस करता है कि जिस व्यक्ति को उसने देखा है, उसका कोई मेल दिमाग में यानी मेमोरी बॉक्स में मौजूद है या नहीं। अगर मिलान हो जाए तो व्यक्ति आसानी से किसी भी दूसरे व्यक्ति को पहचान जाएगा। यह इंफॉर्मेशन प्रोसेसिंग दिमाग के जिस हिस्से में होती है, उसे एसोसिएशन कॉर्टेक्स कहते हैं। यह कॉर्टेक्स सुचारू रूप से काम ना करे या किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाए तो चेहरे पहचानने की समस्या उत्पन्न होने लगती है। ऐसे में व्यक्ति भिन्न-भिन्न लोगों के चेहरों में अंतर कर पाने में सक्षम नहीं रहता।
इसके दो प्रकार हैं- ऑकवर्ड और कांजेनिटल। ब्रेन स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर, दुर्घटना, चोट आदि के कारण एसोसिएशन कॉर्टेक्स को नुकसान पहुंचता है तो इसे ऑकवर्ड प्रोसोपेग्नोसिया कहते हैं। जबकि कांजेनिटल प्रोसोपेग्नोसिया में बचपन से ही एसोसिएशन कॉर्टेक्स पार्ट काम नहीं करता है।
इस बीमारी का अभी तक कोई ठोस और प्रभावकारी इलाज उपलब्ध नहीं है, ना ही कोई सटीक दवा बनी है। मरीज को कुछ प्रशिक्षण और सहारा देकर उसके जीवन को सुगम बनाया जा सकता है। ऑकवार्ड प्रोसोपेग्नोसिया होने पर जिस बीमारी के कारण ऐसा हुआ है यानी स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर या अन्य, उसका इलाज करके भी काफी हद तक राहत पहुंचाई जा सकती है। बच्चों में प्रोसोपेग्नोसिया हो तो टीचर्स, क्लासमेट्स आदि को इसके बारे में बता कर रखना चाहिए और उनसे आग्रह करना चाहिए कि वह बच्चे को परेशान ना करें और उसे हीन भावना से ग्रस्त ना होने दें। साथ ही मरीज को आवाज, हेयर स्टाइल, कद काठी आदि के माध्यम से लोगों को पहचानने का प्रशिक्षण भी देना चाहिए।
प्रस्तुति-शिखर चंद जैन
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