September 30, 2022

World TB Day 2022: टीबी के उपचार से लेकर बचाव तक, विशेषज्ञ से जानें देश में कैसी है संक्रमण की स्थिती

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World TB Day: तपेदिक या क्षय रोग या ट्यूबरक्यूलोसिस (Tuberculosis), माइकोबैक्टीरिया फैलाते हैं, जो सीधे फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। फेफड़ों (Lungs) के अलावा पूरे शरीर पर भी इनका असर देखने को मिलता है। दुनिया में टीबी पेशेंट्स (TB Patients) की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करने और वैश्विक स्तर (World Level) पर इस महामारी को खत्म करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 24 मार्च को ‘वर्ल्ड ट्यूबरकुलोसिस डे’ (World Tuberculosis Day) मनाया जाता है। इस साल वर्ल्ड टीबी डे की थीम ‘इंवेस्ट टू एंड टीबी, सेव लइव्स’ (Invest To End TB, Save Lives) रखी गई है। यानी टीबी को समाप्त करने के लिए अधिक प्रयास करने की जरूरत है ताकि लोगों के जीवन को बचाया जा सके। यह विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा देखा गया कि महामारी के दौर में टीबी के केसेस और उससे होने वाली मौतों की संख्या बढ़ गई। दिल्ली के धर्मशिला नारायण सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट (Senior Pulmonologist) डॉ. नितिन राठी (Dr. Nitin Rathi) ने हरिभूमी से बातचीत में इस बीमारी के प्रकार, स्थिती, उपचार, बचाव और कारण को विस्तार से बताया है।
अच्छी नहीं देश में स्थिति
डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में हर दिन औसतन 4000 लोगों की मौत इस जानलेवा बीमारी से हो जाती है। भारत इस बीमारी से सर्वाधिक प्रभावित एशियाई देश है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में टीबी के कारण होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा मौत भारत में होती है। दुनिया के 24 प्रतिशत टीबी के मामले केवल भारत में हैं। दुनिया में 9.6 मिलियन लोग टीबी से पीड़ित हैं, जिसमें भारत में 2 मिलियन लोग इस बीमारी से प्रभावित है। भारत में टीबी के फैलने का मुख्य कारण इस बीमारी के प्रति लोगों का जागरूक ना होना और शुरुआती दौर में बीमारी को गंभीरता से ना लेना है। डब्ल्यूएचओ ने वर्ष 2030 तक टीबी के पूर्ण उन्मूलन के लिए लक्ष्य निर्धारित किया है, वहीं भारत का संकल्प वर्ष 2025 तक इस उद्देश्य को हासिल करने का है।
टीबी के प्रकार
टीबी मुख्यतः दो प्रकार का होता है। पहला, लेटेंट टीबी जिसमें बैक्टीरिया शरीर में मौजूद होता है, लेकिन व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बैक्टीरिया को सक्रिय नही होने देती है। इसमें टीबी के लक्षणों का अनुभव नही होता औऱ यह एक व्यक्ति से दूसरे में नही फैलती। दूसरा, एक्टिव टीबी जिसमें बैक्टीरिया व्यक्ति के शरीर में विकसित होते हैं और इसके लक्षण भी महसूस होते हैं। अगर किसी व्यक्ति के फेफड़े सक्रिय टीबी से संक्रमित हों तो यह बीमारी एक से दूसरे में आसानी से फैल सकती है। इसके अलावा टीबी को अन्य दो श्रेणियों में भी बांटा जाता है। एक पल्मोनरी टीबी, जो टीबी का प्राथमिक रूप है, जो फेफड़ों को प्रभावित करता है। दूसरा,
एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी, जो फेफड़ों के अलावा अन्य अंगों जैसे हड्डियां, किडनी में होता है। यह वीक इम्यूनिटी वाले लोगों में अधिक होता है।
यदि टीबी का समय पर उपचार नहीं किया जाए तो कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं, जिनमें एमडीआर (मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट) ट्यूबरकुलोसिस, मेनिंजाइटिस या सीएनएस टीबी, क्रोनिक या सुपरेटिव लंग डिजीज, हड्डी और जोड़ों की समस्याएं, लिवर और किडनी से संबंधित बीमारियां शामिल हैं।
इसलिए मजबूत प्रतिरक्षा बनाए रखने और टीबी के शिकार लोगों के संपर्क में आने से बचने की सलाह दी जाती है। स्वच्छता संबंधी कुछ सामान्य तरीकों जैसे खांसते वक्त अपने मुंह को ढंकना, भीड़-भाड़ वाली जगहों में थूकने से परहेज करना और उचित ढंग से चिकित्सा कराना आदि को अपनाया जाना चाहिए।
रोग के कारण
टीबी मुख्य रूप से ट्यूबरकुलोसिस माइक्रो-बैक्टीरियम नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। ये बैक्टीरिया हवा के माध्यम से फैलते हैं। यह प्रभावित व्यक्ति के थूक, बलगम, छींक, खांसने या सांस के संपर्क में आने से एक व्यक्ति से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति को हो जाता है। हालांकि इसका उपचार संभव है, लेकिन 50 प्रतिशत टीबी के रोगियों की मौत दवाओं का कोर्स पूरा नहीं करने के कारण होती है। शहरों का प्रदूषण भी टीबी रोग को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। टीबी की बीमारी होने की कोई आयु नहीं होती, यह किसी भी व्यक्ति को हो सकती है।
टीबी के लक्षण
डायग्नोसिस
छाती का एक्स रे, बलगम की जांच, स्किन टेस्ट और आईजीएम हीमोग्लोबिन जांच करा कर टीबी का पता लगाया जा सकता है। यह सभी जांच सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध हैं।
रोग का उपचार
टीबी एक संक्रामक रोग है, इसे प्रारंभ में ही ना रोका गया तो यह जानलेवा साबित हो सकता है। इस रोग से प्रभावित अंगों में छोटी-छोटी गांठ बन जाती हैं। इससे धीरे-धीरे प्रभावित अंग अपना कार्य करना बंद कर देते हैं, जिससे व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। टीबी का इलाज सरकारी अस्पतालों और डॉट्स सेंटरों में निःशुल्क उपलब्ध है। टीबी का इलाज लंबा चलता है। इसे छह महीने से लेकर दो साल तक का समय ठीक होने में लग सकता है। टीबी के मरीजों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दवा को बीच में ना छोड़ें, बीच में छोड़ देने से बैक्टीरिया में दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगती है और इलाज काफी मुश्किल हो जाता है। इसके बाद दवाएं असर नहीं करतीं है। इलाज शुरू होने के शुरूआती दो हफ्ते से लेकर दो महीने तक इसका संक्रमण फैल सकता है, क्योंकि उस वक्त तक बैक्टीरिया सक्रिय रहता है। इसलिए सावधानी जरूरी है। इसका ट्रीटमेंट लंबा है लेकिन यह प्रभावी है। इसलिए इसमें लापरवाही ना बरतें।
खतरनाक है एमडीआर टीबी
टीबी होने पर कुछ दिन दवा खाने के बाद आराम महसूस होने पर कुछ मरीज दवा खाना छोड़ देते हैं। यह उनके लिए सबसे बड़ा घातक कदम होता है। उसके बाद जब दोबारा दवा की जाती है तो उनके शरीर पर उस दवा का असर कम हो जाता है। शरीर में दवा का इतना रेजिस्टेंस क्रिएट हो जाता है कि सामान्य दवा काम नहीं करती। ऐसी ही दशा में मरीज ( मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस) एमडीआर टीबी की चपेट में आ जाता है। एमडीआर टीबी के इलाज में छह महीने का समय लगता हैं।
टीबी से बचाव के उपाय

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