February 6, 2023

Knowledge News : हरियाणा के नाम की कहानी… आखिर कैसे पड़ा ये नाम

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धर्मेंद्र कंवारी, रोहतक। आज हम हरियाणा नाम की कहानी को जानते हैं। भारत के जिस जमीन के टुकड़े को आप ‘हरियाणा’ के नाम से जानते उसका राज्य के रूप में उदय केवल आधी सदी ही हुई है लेकिन हरियाणा का वजूद और हरियाणा की कहानी सदियों पुरानी है हरियाणा के लोगों को इस बात का गौरव और संतोष होना चाहिए कि सदियों के देशी-विदेशी शासन के बावजूद हरियाणा के प्राचीन नाम से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई।
ऋग्वेद के मंत्र में ‘रजतं हरयाने’ का उल्लेख है, जो यह सिद्ध करता है कि मेरा नामकरण वैदिक ऋषियों ने किया था। ‘आर्यवर्त’ का हरियाणा आज भी उसी प्राचीन नाम से ख्यात है जबकि अन्य समकालीन प्रदेश लम्बी काल यात्रा में अपना मूल नाम खो बैठे।
हरियाणा की धरती का महादेव शिव व योगेश्वर श्रीकृष्ण से गहरा व अटूट सम्बन्ध रहा है। महादेव के छोटे पुत्र कार्तिकेय ने अपने राज्य विस्तार के क्रम में हरियाणा की भूमि पर ही रोहतक में दुर्ग बनवाकर प्रवास किया था।
हरियाणा की एक प्राचीन सामाजिक व्यवस्था ‘खाप’ को लेकर समूचे देश में बार-बार बवाल उठते हैं और अनजाने में शहरी तबका खापों का नाम लेकर कुछ भी बोल देता है उन्हें ये पता ही नहीं है कि खाप हैं क्या और खाप का प्रारंभ-बिंदु कहां है ?
कार्तिकेय के बड़े भाई गणेश सेनाओं में शिक्षण- प्रशिक्षण का दायित्व निभाते थे। पांच सैनिकों की एक लाइन को ‘पंक्ति’ कहते थे और दो पंक्तियों को मिलाकर एक ‘गण’ बनता था। इस तरह गण बनाने के कारण इनका नाम गणेश पड़ा। ये गण ही भविष्य में बढ़ते-बढ़ते ‘खाप’ कहलाये।
महाभारत के ‘सभापर्व’ में कहा गया है कि राजसूय यज्ञ के पश्चात युधिष्ठिर ने नकुल को पश्चिम दिशा में विजय यात्रा के लिए भेजा। उस समय आज की दिल्ली ने का नाम खांडवप्रस्थ था जो बाद में इंद्रप्रस्थ में परिवर्तित हुआ। इंद्रप्रस्थ से आगे नकुल ने जिस क्षेत्र में प्रवेश किया, वह आज का रोहतक था। नकुल ने यहां स्थित कार्तिकेय के भवन पर चढ़ाई की। उस काल खंड में यह प्रदेश अत्यधिक सुन्दरता लिए था और धनधान्य से परिपूर्ण व गौओं से समृद्ध था।
महाभारत के सभा पर्व के अनुसार नकुल को शूरों व मत्तमयूरकों से भारी युद्ध करना पड़ा जो उस समय इस क्षेत्र में बसने वाले क्षत्रियों के वंश थे। उस समय मेरे दो भाग थे मरुभूमि और बहुधान्यक अर्थात मेरा एक भाग मरू अर्थात रेगिस्तान था और दूसरा बहुधान्यक अर्थात भारी मात्रा में अन्न उपजाने वाला इन दोनों भागों को नकुल ने जीता।
शूरों व मत्तमयूरकों के वंशज ही आगे चलकर ‘यौधेय’ कहलाये। इन यौधेयों के भय से ही आक्रांत होकर सिकंदर की सेनाओं ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। था और सिकंदर को हरियाणा की सीमा को छूने से पहले ही वापस लौटना पड़ा था।
यौधेय कार्तिकेय को सेनापति के रूप में मानते थे। 1935-36 में डॉ. बीरबल साहनी के मार्गदर्शन में रोहतक नगर की परिधि पर स्थित खोखरा कोट के खंडहरों की खुदाई से यौधेय साम्राज्य की पुष्टि हुई है। इस खुदाई में यौधेयों के सिक्के ढालने के हजारों ठप्पे मिले, जिनका समय ईसा से सौ-दो सौ साल पहले का माना गया है। इन सिक्कों पर शिवजी के वाहन नंदी को देखा जा सकता है। सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में यौधेयानां बहुधान्यके’ ऑकित है। तकरीबन 1500 साल पहले विदेशी कुषाणों को जीतकर यौधेयों ने जो सिक्के चलाए, उन पर कार्तिकेय अपना शस्त्र ‘शक्ति’ लिए खड़े हैं। उनके साथ ही उनका वाहन मोर है। ब्राह्मी लिपि में यौधेयगणस्य जय’ लिखा है। ये सिक्के आज भी झज्जर गुरुकुल के संग्रहालय में देखे जा सकते हैं।
कार्तिकेय के ध्वजचिन्ह ‘मोर’ को अंगीकार करने के कारण ही इनका नाम ‘मत्तमयूरक’ पड़ा था। आज भी इस चिन्ह का हरियाणा में प्रचलन है और यहा के लोग मौर के प्रति पवित्र भाव रखते हैं। हरियाणा में जो पुराने घर हैं आज भी उनपर मोर की आकृति लगी हुई आसानी से देखी जा सकती है। मुस्लिम व फिरंगी शासन काल में भी इस क्षेत्र में मोर के मारने पर कड़ा प्रतिबन्ध था। फिरंगी शासन में तो मोर का शिकार करने पर किसानों ने कई अंग्रेजों से भी टक्कर ली थी। यही मोर हमारे भारत का राष्ट्रीय पक्षी भी है।
अतीत में, आज के उत्तराखंड में स्थित हरिद्वार और समूचा वृजलोक (मथुरा) हरियाणा में ही समाये थे। आज भी बृजभूमि का एक बड़ा भाग फरीदाबाद-पलवल के रूप में बृज संस्कृति व भाषा की कहानी कहता है। हरियाणा का कुरुक्षेत्र तो महाभारत का रणक्षेत्र है ही, जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अवसाद से बाहर निकालकर धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के लिए तत्पर किया और इसी बहाने ‘गीता’ जन्मी हरि (कृष्ण) का रथ (यान) मेरी भूमि पर चला, इसी तर्क पर कुछ विद्वान ‘हरियाणा’ नामकरण को आधार देते हैं।

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