November 28, 2022

जानिए क्या है ब्रेन स्ट्रोक , ना बरतें कोई लापरवाही

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ब्रेन स्ट्रोक किसी को कभी भी हो सकता है। लेकिन कुछ बातों को अपनी जीवनशैली में अपनाकर इसके रिस्क को कम किया जा सकता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार कुछ संकेतों को पहचान कर ट्रीटमेंट शुरू कर दिया जाए तो पेशेंट की जान भी बचाई जा सकती है। ब्रेन स्ट्रोक के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार के बारे में जानिए।

हर साल वर्ल्ड स्ट्रोक-डे मनाने का उद्देश्य स्ट्रोक की गंभीरता, इसके बढ़ते मामलों, इसकी रोकथाम और इलाज के प्रति लोगों को जागरूक कर उन्हें इसके खतरों से बचाना है। ब्रेन स्ट्रोक होने के बाद तुरंत उपचार उपलब्ध कराना सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि समय पर उपचार मिलने से जान बचने में सहायता मिलती है और विकलांगता के खतरे को काफी कम किया जा सकता है। उपचार में देरी से मस्तिष्क की कोशिकाएं स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए, इस बार वर्ल्ड स्ट्रोक-डे की थीम द पॉवर ऑफ सेविंग प्रिशियस टाइम (कीमती समय को बचाने की शक्ति) रखी गई है। 

क्या कहते हैं आकड़े 

ब्रेन स्ट्रोक विश्व भर में मृत्यु और विकलांगता के सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 60 साल से अधिक उम्र के लोगों में स्ट्रोक मृत्यु का सबसे प्रमुख कारण है, जबकि 15-59 साल की उम्र के लोगों में मृत्यु का पांचवां कारण है। विश्व में हर 2 सेकेंड में एक व्यक्ति ब्रेन स्ट्रोक का शिकार होता है, जबकि हर 10 सेकेंड में एक व्यक्ति की मृत्यु ब्रेन स्ट्रोक के कारण होती है। ब्रेन स्ट्रोक की चपेट में आने के पश्चात अधिकतर लोगों का जीवन सामान्य नहीं रह जाता। लेकिन सही उपचार, उचित देखभाल और सहयोग से जीवन को फिर से सामान्य बनाने का प्रयास किया जा सकता है। नेशनल स्ट्रोक असोसिएशन के अनुसार ब्रेन स्ट्रोक के ट्रीटमेंट के बाद भी दो-तिहाई पेशेंट में किसी प्रकार की विकलांता रह जाती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि ब्रेन स्ट्रोक से बचाव पर ध्यान दिया जाए।

क्या है ब्रेन स्ट्रोक

मस्तिष्क की लाखों कोशिकाओं को जीवित रहने और अपने सामान्य कार्य करने के लिए रक्त और ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। मस्तिष्क की ओर जब रक्त की आपूर्ति कम या बंद हो जाती है, तो उसकी कोशिकाएं अस्थाई या स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, यही ब्रेन स्ट्रोक है। इसे ब्रेन अटैक या दिमागी दौरा भी कहा जाता है। रक्त संचरण में रुकावट मस्तिष्क में ब्लड क्लॉट बनने या ब्लीडिंग होने के कारण हो सकती है। जब मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाएं फट जाती हैं, तो इसे ब्रेन हैमरेज कहते हैं। इस कारण पक्षाघात होना, याददाश्त जाने की समस्या, बोलने में असमर्थता जैसी स्थिति आ सकती है।

प्रमुख लक्षण 

मस्तिष्क का कौन-सा भाग स्ट्रोक की चपेट में आया है उसके आधार पर निम्न लक्षण दिखाई दे सकते हैं-

-अचानक संवेदनशून्य हो जाना।

-चेहरे, हाथ या पैर में विशेष रूप से शरीर के एक भाग में कमजोरी आना।

-समझने या बोलने में मुश्किल होना।

-एक या दोनों आंखों की देखने की क्षमता प्रभावित होना।

-मांसपेशियों का विकृत हो जाना।

-चलने में मुश्किल आना, चक्कर आना, संतुलन की कमी हो जाना।

-अचानक गंभीर सिरदर्द होना।

-फेस ड्रूपिंग यानी चेहरे का एक ओर झुक जाना या सुन्न होना।

-आर्म वीकनेस यानी हाथों का सुन्न होना या नीचे की ओर लटक जाना।

ब्रेन स्ट्रोक के कारण

मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के या उनके फट जाने के कारण ब्रेन स्ट्रोक होता है। इसके 80 प्रतिशत मामले रक्त नलिकाओं में क्लॉट जमने के कारण होते हैं, जबकि 20 प्रतिशत मामले मस्तिष्क में ब्लीडिंग के कारण होते हैं।

रक्त नलिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का मुख्य कारण आर्टियोस्क्लेरोसिस है। इसके कारण नलिकाओं की दीवारों में वसा, संयोजी उतकों, क्लॉट, कैल्शियम या अन्य पदार्थों का जमाव हो जाता है। इस कारण नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे उनके द्वारा होने वाले रक्त संचरण में रुकावट आती है या नलिकाओं की दीवार कमजोर हो जाती है। इसके अलावा हृदय रोग, धूम्रपान, मधुमेह, शारीरिक सक्रियता की कमी और कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर इसके खतरे को बढ़ा देते हैं। अनुवांशिक कारणों से भी ब्रेन स्ट्रोक होने की आशंका तीन गुना तक बढ़ जाती है। 

इन्हें होता है अधिक खतरा

स्ट्रोक होने का कोई निश्चित कारण तो नहीं है, लेकिन कुछ रिस्क फैक्टर्स इसका खतरा बढ़ा देते हैं, इनमें शामिल हैं-  

-टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों में इसका खतरा काफी बढ़ता है।

-हाई ब्लड प्रेशर के मरीज इसकी चपेट में जल्दी आ जाते हैं।

-मोटापा, ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण हो सकता है।

-धूम्रपान, शराब और गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन ब्रेन अटैक को निमंत्रण देने वाले कारण माने जाते हैं।

-कोलेस्ट्रॉल का बढ़ता स्तर और घटती शारीरिक सक्रियता भी इसका कारण बन सकती है।

ब्रेन स्ट्रोक आने पर क्या करें

ब्रेन स्ट्रोक के लक्षणों को नजरअंदाज न करें। मरीज को तुरंत हॉस्पिटल ले जाएं। इस बीच रक्तदाब को नियंत्रित करने वाली दवाई ना लें। हॉस्पिटल में न्युरोलॉजिस्ट के पास जाएं। तुरंत उपचार कराना इसलिए जरूरी है कि स्ट्रोक आने के एक घंटे में मस्तिष्क उतने न्युरॉन्स खो देता है, जिसे बनने में लगभग साढ़े तीन वर्ष लगते हैं। प्राथमिक स्तर पर इसके उपचार में रक्त संचरण को सुचारू और सामान्य करने की कोशिश की जाती है ताकि मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सके। स्ट्रोक अटैक के तीन घंटे के भीतर जो उपचार उपलब्ध कराया जाता है उसे गोल्डन पीरियड कहते हैं।

बचाव के उपाय

जीवनशैली और खान-पान की आदतों में बदलाव के कारण आज उम्रदराज लोग ही नहीं युवा भी स्ट्रोक की चपेट में तेजी से आ रहे हैं। रक्तदाब को नियंत्रित रखकर और शारीरिक रूप से सक्रिय रहकर काफी हद तक स्ट्रोक से बचा जा सकता है। इसके अलावा इन बातों का भी ध्यान रखें-

-तनाव न लें, मानसिक शांति के लिए ध्यान करें।

-धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें।

-नियमित रूप से व्यायाम और योग करें।

-अपना भार औसत से अधिक ना बढ़ने दें।

-हृदय रोगी और मधुमेह के रोगी विशेष सावधानी बरतें।

-सोडियम का अधिक मात्रा में सेवन न करें।

-गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन ना करें, परिवार नियोजन के दूसरे तरीके अपनाएं।

इलाज

स्ट्रोक का कोई भी लक्षण दिखाई दे तो पीड़ित को तुरंत अस्पताल ले जाएं। क्लॉट डिजॉल्विंग ड्रग्स और इंटरवेंशन तकनीक ने स्ट्रोक के उपचार को बेहतर बनाया है। कुछ दवाइयों के द्वारा धमनियों के ब्लॉकेज को खोलने का प्रयास किया जाता है लेकिन इन दवाइयों को स्ट्रोक आने के 4-5 घंटे के भीतर ही दिया जाना चाहिए। उसके बाद ये कारगर नहीं होती हैं। रक्त को पतला करने की दवाइयां स्ट्रोक के उपचार का एक प्रमुख भाग है। लेकिन उन मरीजों में रक्त को पतला करने वाली दवाइयां कारगर नहीं होती जिनकी रक्त कोशिकाएं अत्यधिक संख्या में ब्लॉक हो जाती हैं। ऐसे मामलों में न्यूरोइंटरवेंशन तकनीक के द्वारा रक्त के थक्के को निकालकर रक्त संचरण को पुन: प्रारंभ किया जाता है।

स्ट्रोक के बाद देखभाल 

एक बार स्ट्रोक की चपेट में आने पर उपचार होने के बाद भी दोबारा इसके होने का खतरा बना रहता है। दोबारा स्ट्रोक होने की आशंका पहले सप्ताह में 11 प्रतिशत, और पहले तीन महीनों में 20 प्रतिशत तक होती है। इसलिए ठीक होने के बाद भी आवश्यक सावधानियों बरतना जरूरी है। डॉक्टर द्वारा सुझाई दवाइयां समय पर लें, संतुलित और पोषक भोजन का सेवन करें। शारीरिक सक्रियता बहुत जरूरी है। इसलिए नियमित रूप से टहलें या हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें। तनाव से बचें, क्योंकि इससे हाइपरटेंशन या उच्च रक्तचाप की समस्या होती है जिससे दोबारा स्ट्रोक के चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है।

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