December 8, 2022

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत के अलावा लिखा था इस देश का राष्ट्रगान, जानिए उनके जीवन के बारे में कुछ खास बातें

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भारत (India) इस बार अपने आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है। इस खुशी में इस बार देश में आजादी का अमृत महोत्सव (Amrit Mahotsav) भी सेलिब्रेट किया जा रहा है। लेकिन यह तो हम सब जानते हैं कि देश को आजाद करवाने में बहुत से लोगों का हाथ था। बहुत से लोगों ने देश के लिए बलिदान भी दिया। इसके साथ ही आजादी से पहले भारत में ऐसे कई लोग पैदा हुए जिन्होंने देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया। इन्हीं में से एक थे रबीन्द्रनाथ टैगोर। रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) को उनके ज्ञान, कलात्मकता, देशभक्ति और उपलब्धियों के लिए गुरुदेव कहा जाता था। बहुत से लोग आज भी उनके सम्मान में उनके नाम से पहले गुरुदेव लगाते हैं। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ लिखने का श्रेय भी उन्ही को जाता है।
रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ था और उनका निधन 7 अगस्त 1941 को हुआ। भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्र गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ही लिखा था। तो चलिए आज आजादी के अमृत महोत्सव और उनकी पुण्यतिथि के अवसर हम आपको उनके बारे में कुछ खास बातें बताते हैं।
कम उम्र में शुरु किया लिखना
बता दें कि रबीन्द्रनाथ टैगोर को बचपन से ही साहित्य में काफी रूचि थी। उन्होंने सिर्फ 8 साल की कम उम्र में ही कविताएं और कहानियां लिखना शुरु कर दिया था। 16 साल की उम्र में आने तक उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हो गई थी। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सी कविताएं, उपन्यास, निबंध, गीत और नाटक लिखे। टैगोर की प्रमुख रचनाओं में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिन, पोस्ट मास्टर जैसी कई रचनाएं शामिल है। साल 1913 में रबीन्द्रनाथ को उनकी महान रचना गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबल पुरस्कार भी दिया गया था।
रबीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं पर बनी फिल्में
फिल्म प्रोड्यूसर और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता सत्यजीत रे ने रबीन्द्रनाथ टैगोर की शॉर्ट स्टोरीज और उपन्यासों पर बेस्ड बहुत सी फिल्में बनाई हैं। इनमें मिलन, उपहार, नौका डूबी, चारुलता जैसी कई फिल्में शामिल हैं।
रबीन्द्रनाथ टैगोर ने लौटा दी थी नाइटहुड की उपाधि
साल 1915 में ब्रिटेन के जॉर्ज पंचम ने रबीन्द्रनाथ को नाइटहुड की उपाधि से नवाजा था। इस दौर में नाइटहुड की उपाधि पाने वाले शख्स के नाम के पहले ‘सर’ लगाया जाता था। लेकिन जब साल 1919 में जलियांवाला बाग में भीषण नरसंहार हुआ तो उसके विरोध में टैगोर ने अंग्रेजों को यह उपाधि लौटा दी थी।
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