October 4, 2022

Knowledge News: क्या था असहयोग आंदोलन, जानिए किस कारण महात्मा गांधी को लेना पड़ा इसे वापस?

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Knowledge News: क्या था असहयोग आंदोलन

Knowledge News: भारत को स्वतंत्रता (Independence Of India) कैसे मिली ये अपने आप में एक बड़ा इतिहास (History) है। भारत की स्वतंत्रता और इसके इतिहास के बारे में छोटे से बड़े लेवल तक की कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है। हमारे देश को मिली इस स्वतंत्रता के पीछे कई महान लोगों का हाथ तो है ही, लेकिन इसमें भारत की जनता (People Of India) का भी उतना ही बड़ा योगदान रहा है। यहां हम आपको देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) द्वारा चलाए गए जन आंदोलन यानी असहयोग आंदोलन (Non Cooperation Movement) के बारे में बताएंगे और कोशिश करेंगे कि इस एक विषय पर विस्तार से जानकारी दे पाएं…
असहयोग आंदोलन
असहयोग आंदोलन 1920 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया पहला जन आंदोलन था, जिसमें भारतीयों को ब्रिटिश सरकार से अपना सहयोग वापस लेने के लिए प्रेरित किया गया था, जो भारत को आजादी दिलाने की ओर पहला कदम था। दरअसल साल 1919 में भारत पर राज कर रही ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट को पास किया गया। इस कानून ने कुछ राजनीतिक मामलों को बिना जूरी के मुकदमा चलाने की अनुमति दी और बिना मुकदमे के संदिग्धों को नजरबंद करने की अनुमति दी। उनका उद्देश्य एक स्थायी कानून द्वारा युद्धकालीन भारत रक्षा अधिनियम (1915) के दमनकारी प्रावधानों को प्रतिस्थापित करना था। इसके बाद गांधी ने देशभर में इस एक्ट के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरु किया।

इस आंदोलन में गांधी ने देशवासियों से अपील की वो ब्रिटिश सरकार और भारत में अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए जो सहयोग कर रहे हैं उन्हें बंद कर दे। मोटा-मोटी ये समझिए कि महात्मा गांधी ने देशवासियों से ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत आने वाले सभी कामों से अपना सहयोग वापस लेने के लिए कहा था। गांधी का ये मानना था कि भारत में अंग्रेज शासन इसलिए ही कर पा रहें हैं क्योंकि भारतीय उनका चुपचाप सहयोग कर रहे हैं।
आंदोलन में क्या हुआ था
क्यों आंदोलन लेना पड़ा वापस
इस आंदोलन को अहिंसा के साथ शुरु किया गया था। लेकिन फरवरी साल 1922 में हुई चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधी द्वारा इसे वापस ले लिया गया। अब जानिए कि चौरी-चौरा में दरअसल हुआ क्या था। चौरी-चौरा उत्तर प्रदेश के जिले गोरखपुर में एक कस्बा है। साल 1922 में चौरी-चौरा में असहयोग आंदोलन को लेकर प्रदर्शन कर रहे कुछ प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी और फाइरिंग में करीबन 22 पुलिसवालों को मार दिया। इसके जवाब में हुई पुलिस फाइरिंग में कई प्रदर्शनकारियों ने भी अपनी जान गंवा दी थी। इस कांड में हुई हिंसा को मद्देनजर रखते हुए महात्मा गांधी को यह आन्दोलन तुरंत वापस लेना पड़ा। उनका कहना था कि आंदोलन में हुई किसी भी प्रकार की हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

आलोचना का सामना
इस आंदोलन को वापस लेने के फैसले के कारण महात्मा गांधी को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। कई राष्ट्रवादियों ने महसूस किया था कि हिंसा की अलग-अलग घटनाओं के कारण असहयोग आंदोलन को रोकना नहीं चाहिए था। आंदोलन को वापस लेने के फैसले ने अधिकांश राष्ट्रवादियों जो गांधी में विश्वास रखते थे उन्हें हतोत्साहित किया था। इस आंदोलन के स्थगित किए जानें पर मोतीलाल नेहरू का कहना था कि अगर कन्याकुमारी के एक गांव ने अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सज़ा हिमालय के एक गांव को क्यों मिलनी चाहिए। वहीं सुभाष चंद्र बोस ने कहा कि “ठीक इस समय, जबकि जनता का उत्साह चरम सीमा पर था, वापस लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं”। अपने फैसले के संदर्भ में अपनी यंग इंडिया पत्रिका में महात्मा गांधी ने लिखा, “आन्दोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर एक अपमान, हर एक यातनापूर्ण बहिष्कार, यहां तक की मौत भी सहने को तैयार हूं।”

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